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वोटर का ‘गणित’ और ‘मनोविज्ञान’!

Posted on : May 14 2019


वोटर का ‘गणित’ और ‘मनोविज्ञान’!

घनश्याम दुबे, राजनैतिक दलों और उसके नेताओं का ‘गणित’ और ‘मनोविज्ञान’ तो होता ही है, वोटरों का भी होता है। यह नया नहीं है। इसके तरीके भी समय के साथ बदलते गए हैं। यह एक-दो-तीन या चार नहीं, बहु आयामी है! यह 77 से लेकर 2019 तक चला आ रहा है। इसके पहले भी था, पर इतना उजागर नहीं था। पिछले तीन दशकों खासतौर से जब राजनीति प्रत्यक्ष रूप से ‘धंधा’ बनती गयी उसी तरह से नेताओं और वोटरों दोनों के गणित ने भी अपने रंग दिखाने शुरू किये हैं। अन्त में नेता इस दौड़ मंे हमेशा जीतते हैं, और हारता वोटर ही है। 77-84 और 2014 तो कभी-कभी ही होते हैं।

1977 में भी वोटर का गणित कम, ‘मनोविज्ञान’ साफ दिखा था। आपातकाल मंे जब सभी संस्थाएं पहली बार लगभग खतरे में आती दिखाई दीं, और सिर्फ जीत की निरंकुश चाह ने देश को हिला दिया तो पूरे देश का वोटर जागा या जगाया गया तो इसी वोटर के मनोविज्ञान ने इंदिरा जैसी ताकतवर नेत्री को उनकी औकात बता दी। उस समय कोई गणित नहीं था, सिर्फ शुद्ध रूप से मनोविज्ञान था-‘इंदिरा हटाओ’। 84 मंे इंदिरा की हत्या के बाद भीषण दंगे और इससे उपजे मनोवैज्ञानिक ज्वार ने पूरे ‘देश पर ‘पंजे की छाप’ ने कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत पर मुहर लगा दी। ऐसा जल्दी और बार-बार नहीं होता है।

2014 भी ऐसा ही था। यूपीए के सहयोगी दलों के- ‘भ्रष्टाचार’ को नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ा हथियार बनाते हुए अपने ‘इवेंट मैनेजमेंट’ के करिश्माई शो तथा कैची और सपनीले नारों-वादों-‘अच्छे दिन आएंगे, और 15-15 लाख, ने वोटर के ‘मनोविज्ञान’ और ‘गणित’ ने लगातार दो बार की यूपीए या कांग्रेस को कौड़ी का तीन कर 44 पर ला दिया। 1977 में भी वोटर का यही मनोविज्ञान था और 2014 में भी यही था। फिर भी दोनों में अंतर था। 2019 में न वह बात है, न वह तासीर है, किसी भी दल के लिए। अब नेताओं-दलों का शुद्ध रूप से ‘गणित’ है तो वोटर का गणित भी निश्चित तौर पर होगा ही!

पाँच दशक पहले पूर्वांचल के कुछ जिलों के ग्रामीण वोटरों का सबसे बड़ा पैमाना था-जाति-उपजाति। या फिर कांग्रेस सवर्ण-दलित-अल्पसंख्यक ये तीन पैमाने केन्द्रीय चुनावों के साथ प्रदेशों की विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से छाये रहे। कांग्रेस का कमोबेश एकछत्र राज्य रहा। उस समय 80 प्रतिशत ग्रामीण मतदाता मतदान में अपने ही ‘गणित’ से चलते रहे! इसे तोड़ा ’मंडल आंदोलन’ ने वीपी0 सिंह इसी के साथ-रक्षा सौदे में जब से ऐसा कागज निकाल कर, अपनी सभी सभाओं में दिखाते रहे, उनके अलावा शायद ही कोई जानता था कि उसमें कुछ लिखा भी है, या वह ‘कोरा’ ही है। इसने वोटरों के मन में ‘शक’ पैदा किया और वोटरों का ‘मनोविज्ञान’ बदल गया। वह प्रधानमंत्री बन गए। राजनैतिक दलों के तौर तरीके देश के वोटरों का मिजाज और मनोविज्ञान बदलते रहे हैं। ‘मंडल’ की काट में ‘कमंडल’ के राजैनतिक ‘गणित’ 1980 मंे बनी भाजपा को धीरे-धीरे उस मकाम पर ले जाने लगा कि वह देश-प्रदेशों की सत्ता पर काबिज होने लगी। काबिज होते-होते या कभी बाहर-भीतर होते-होते 2014 में वह ‘मोदी युग’ में पदार्पण कर गई। इस तरह 2019 केे दूसरे पड़ाव के वर्तमान लोकसभा के चुनाव का छह चरण पूरे चुके हैं। आखिरी चरण बाकी है, पर वोटरों के गणित और मनोविज्ञान को सभी दलों ने अपने-अपने ‘तरीकों’ से खूब खेला है अब तक!

50 साल पहले वोटर इतना चालाक नहीं था। तब भी उसके मन में ‘जाति’ का समीकरण मौजूद था। यह उसका सबसे बड़ा पैमाना था। उस समय पूर्वांचल के 8-10 जिलों में एक राजनैतिक दल था,-चौधरी चरण सिंह की ‘बीकेडी’ यानी भारतीय क्रांति दल। मुख्य रूप से यह कुर्मियों की जो बाद में ‘पटेल’ होते गए, उनकी पार्टी मानी जाती थी। आज का ‘अपना दल’ उसी का रूपांतरित प्रतिरूप है, जिसे सोनेलाल ने बहुत पहले पहचान लिया था। पूर्वांचल में इस दल का काफी महत्व है। अब इसे कोई जल्दी नकार नहीं सकता। 2014 के लोस और 2017 के विस चुनावों में भाजपा इसका इस्तेमाल-असर देख चुकी है। राजभर की पार्टी भी उसी जातिगत गणित-मनोविज्ञान का ही विस्तार है! उसी तरह बसपा और सपा के भी मतदाताओं का जातीय गणित उनके दिल के भीतरी कोनों में आज भी बरकरा है।

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