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वोटर का ‘गणित’ और ‘मनोविज्ञान’!

Posted on : May 14 2019


वोटर का ‘गणित’ और ‘मनोविज्ञान’!

आज ग्रामीण वोटर हांे या शहरी, सबसे पहले वह राजनैतिक दलों से ‘तात्कालिक’ लाभ लेना चाहते हैं। दीर्घकालिक लाभ इनके लिए बाद की बात होती है। राजनैतिक दलों के नेता और व्यूहरचना बनाने वाले जिम्मेदार और प्रमुख लोगों का ‘गणित-मनोविज्ञान’ भी लगभग यही होता है। जातीय समीकरण को तोड़ने की दलों की हालिया कोशिशें नहीं भी यही रहीं है। ‘शिक्षा मित्रों के अध्याय’ का उद्भव यही रहा है। सरकारें अपनी ताकत बनाने-बढ़ाने की ऐसी ही कसरतें करती आई हैं। उनको इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि इससे शिक्षा की बुनियाद-प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता, रसातल को चली आएगी। उन्हें अपना एक वोट बैंक चाहिए। अतीत में भी यह कई रूपों में सामने आ चुका है।

इन सब को धराशायी करने के लिए ‘सपने’ दिखने भी जरूरी हो जाते हैं। वोटर भी जानता है कि उसका लाभ कहाँ और कैसे है। यही उसका सीधा मनोविज्ञान है। जातियों-उप जातियों को चलाने वाली पार्टियों के मठाधीशों को सरकारें उनके असर को देखते हुए-समय-समय पर उनका ‘साथ’ पकड़ती हैं और फायदा पहुँचाने वालांे को पद प्रतिष्ठा से उपकृत भी करती रही हैं।

जिसे ‘लहर’ कहते हैं, यह स्वतः पैदा होती है या की जाती है। 2014 का लोस चुनाव इसका हालिया उदाहरण है। 77-84 में स्वतः स्फूर्ति थी। लहर के सामने सारे समीकरण बिखर जाते हैं, चकनाचूर हो जाते है। पैदा करने के कई तरीके पुराने और नये दोनों हैं। पिछले 20-25 सालों से यह राजनैतिक दलों का प्रमुख अस्त्र रहा है। ऐसे में वोटर ‘गच्चा’ खाता है तो पैदा की गई ‘लहर’ के चकमों को चलते। हालांकि वह कम ही गड़बड़ाता है। नेताओं की तरह वोटरों की आंख सीधे चिडि़या पर ही होती है। पर राजनैतिक कुरूक्षेत्र में हर चीज ‘जायज’ मान ली जाती है, या बना दी जाती है। यह पक्ष-विपक्ष दोनों ही करते हैं। इसमें कोई कम दोषी, कोई ज्यादा दोषी हो सकता है! इससे ज्यादा नहीं!

हाल के वर्षोंे में एक नई धारा चली है। वह है-वोटर भी धीरे-धीरे ‘नेता’ बनने लगा है। नेता तो हर तरह से एक मजबूत प्रजाति होती है, पर वोटर में भी यह ‘रोग पनपने लगा है। वह सिर्फ वोट ही दे सकता है या बरगलाया-फुसलाया जा सकता है। नेता का बरगलाया नहीं जा सकता। ज्यादातर वोटर साफ-सुथरी, उनके या समाज के सभी वर्गों के लाभ के बारे में सोचने वाली सरकारें चाहता है। इसमें कुछ वोटर भ्रष्ट सरकार चाहते है। ये ठेकेदार, दबंग होते हैं। यही वे वोटर हैं, जो भविष्य में वोटर से नेता बनने-चुनाव लड़ने की राह पर हैं। उनका ‘गणित-मनोविज्ञान’ बहुताय वोटरों से अलग है। ऐसे वोटर भ्रष्ट सरकारों के प्रिय भी होते हैं। अमूमन टिकट भी कभी-कभी इन्हें मिल जाता है।

एक पुरानी कहावत है- ‘चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर, कटता खरबूजा ही है’। वोटर वही खरबूजा है, जाने या अनजाने! जिस तरह से राजनैतिक दलों और नेताओं के ‘गणित’ बदलते रहे हैं, उसी तरह से वोटरों का ‘गणित’ भी बदलता रहा है। वोटर अभी सार्थक रूप से मजबूत नहीं हो पाया है। उसको और ताकतवर बनाये जाने की जरूरत है। यही समाज, सिस्टम और सरोकारों वाली सरकारें ला सकता है। अभी इसमे ‘देर’ है ...।

आजादी के बाद से अब तक करीब 30 प्रतिशत वोटर ही सार्थक सोच का बन सका है। 70 प्रतिशत अब भी अपने स्वार्थों के चलते या तो ‘भेड़’ है या बना दिया जाता है। वह काम धीरे-धीरे राजनैतिक दल करते हैं। वोटरों के गणित और मनोविज्ञान में धर्म संप्रदाय 38 साल पहले ही प्रवेश कर चुका है, पर कभी-कभी यह सिर चढ़कर बोला है। यह बताने की जरूरत नहीं है। राजनैतिक दल-नेता की सत्ता की लालसा अपने हितों के लिए वोटरों के ‘गणित मनोविज्ञान’ को अपने पक्ष में ढालने की पुरजोर कोशिश तो करता ही है, और करेगा भी। बचना तो वोटर को ही होगा। वोटर ‘चालाक’ तो बहुत हुआ है, पर ‘समझदार’ अभी तक नहीं हो पाया है। इसके लिए अलग से एक ‘नये सिस्टम’ को बनाना होगा। शायद कभी यह बन पाए...।

 



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