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अमरनाथ यात्राः जानिए, पवित्र गुफा का इतिहास और अमरत्व का रहस्य

Posted on : Jun 27 2018


अमरनाथ यात्राः जानिए, पवित्र गुफा का इतिहास और अमरत्व का रहस्य

इंडिया इमोशन्स न्यूज जम्मू-कश्मीर में श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा की महिमा निराली है। श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में समुद्रतल से लगभग 13,600 फीट ऊंचाई पर पवित्र गुफा में भगवान भोलेनाथ साक्षात बर्फ के शिवलिंग स्वरूप में विराजमान हैं।अमरनाथ यात्रा का पौराणिक महत्व है, काशी में शिवलिंग के दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयास से सौ गुना और नैमिषारण्य से हज़ार गुना पुण्य प्राप्ति का जरिया है, बाबा बर्फानी के शिवलिंग स्वरूप के दर्शन करना। अमरनाथ यात्रा का हिन्दू धर्म में काफी महत्व है। अमरनाथ की पवित्र गुफा हिन्दुओं के लिए विशेष तीर्थ स्थल है।प्राचीनकाल में पवित्र गुफा के स्थान को अमरेश्वर महादेव या अमरेश्वर कहा जाता था। आजकल बाबा अमरनाथ को बाबा बर्फानी कहकर पुकार जाता है।


पवित्र गुफा में अमरत्व का गूढ़ रहस्य
अमरनाथ गुफा भगवान शंकर के प्रमुख निवास स्थानों में से एक है। कैलाश पर्वत और अमरनाथ गुफा की यात्रा को मोक्ष प्राप्ति और पुण्य की भागीदारी के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल माना जाता है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है, क्योंकि अमरनाथ गुफा में ही भोले भंडारी ने मां पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा में बर्फ के प्राकृतिक शिवलिंग का बनाना एक चमत्कार है। बर्फ से बने स्वयंभू हिम शिवलिंग के दर्शन कर भक्त खुद को धन्य समझते हैं। बाबा अमरनाथ की गुफा 150 फीट ऊंची और करीब 90 फीट ऊंची है। पवित्र गुफा के परिसर के एक छोर में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें टपकती है, जो एक जगह पर हिम बूंदोंं के साथ इकट्ठा होकर लगभग 10 से 12 फीट ऊंचा शिवलिंग बनता है, जिसका साल दर साल आकार बढ़ता-घटता रहता है। श्री अमरनाथ के स्वयंभू शिवलिंग से थोड़ी ही दूरी पर मां पार्वती, गणेश और भैरव भी हिम शिवलिंग रूप में विराजमान हैं।


पवित्र गुफा का इतिहास
श्री अमरनाथ की पवित्र गुफा को पहली बार एक गड़रिए ने 18वीं-19वीं शताब्दी में खोज निकाला था, जिसे बूटा मलिक कहा जाता है। बूटा मलिक पवित्र गुफा के आसपास बकरियां चराने गया था। इतिहासकारोंं के मुताबिक 1869 में ग्रीष्मकाल में गुफा की खोज की गई थी और पहली बार औपचारिक तौर पर अमरनाथ तीर्थ यात्रा 3 साल बाद 1872 में आयोजित की गई थी, जिसमें पूरी यात्रा के दौरान मलिक भी साथ थे। अमरनाथ यात्रा को पहले मट्टन के कश्मीरी ब्राह्मण के सहयोग से आयोजित किया जाता था और बाद में बटकुट में मलिकों ने यात्रा की जिम्मेदारी संभाल ली। दरअसल अमरनाथ यात्रा मार्ग की देखरेख और गाइड के तौर पर मलिकों ने अहम भूमिका अदा की है। अमरनाथ यात्रा के दौरान बीमारों, बुजुर्गों की सहायता और श्रद्धालुओं को गुफा तक की सारी यात्रा कराना मलिक अपनी पहली प्राथमिकता समझते हैं। आज भी अमरनाथ यात्रा के दौरान जो चढ़ावा होता है, उसका चौथाई हिस्सा मुसलमान गडरिये के वंशजों को ही मिलता है।


पवित्र गुफा की यात्रा के दो रास्ते
श्री अमरनाथ गुफा के लिए श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार दो रास्तों में से किसी एक का चयन कर सकते हैं। पहला रास्ता जम्मू से पहलगाम होते हुए पवित्र गुफा तक जाता है, जो करीब 50 किलोमीटर है। इसमें श्रद्धालुओं का जत्था पड़ाव-दर-पड़ाव आगे बढ़ता है। वहीं दूसरा रास्ता श्रीनगर से सोनामार्ग-बालटाल होते हुए करीब 145 किलोमीटर दूर है। यहां बालटाल बेस कैम्प से पवित्र गुफा की दूरी महज 14 किलोमीटर ही है। हालांकि ये यात्रा मार्ग अति दुर्गम और कठिन माना जाता है। हर साल श्री अमरनाथ यात्रा के सफलतापूर्वक आयोजन के लिए श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड का गठन किया है। श्राइन बोर्ड यात्रा के लिए श्रद्धालुओं का पंजीकरण और तमाम सुविधाओं के लिए प्रयासरत रहता है।



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