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गांवों की तरफ लौटकर ही देश को खुशहाल बनाया जा सकता है

Posted on : Dec 20 2016


गांवों की तरफ लौटकर ही देश को खुशहाल बनाया जा सकता है

इंडिया इमोशंस आस्था डेस्क. किसी मित्र ने एक बार ओशो से पूछा कि विनोबा भावे और गांधी जी तो ग्राम स्वराज और सर्वोदय पर जोर देते हैं। सर्वोदय के अनुसरण से ही हिन्दुस्तान असली समृद्धि हासिल कर सकता है। गांवों की तरफ फिर से लौटकर ही देश को खुशहाल बनाया जा सकता है। असली समाजवाद लाया जा सकता है। गुरूदेव... इस संबंध में हम आपके विचार जानना चाहते हैं।

ओशो कहते हैं कि विनोबाजी का सर्वोदय हो या गांधीजी का, समाजवाद उससे नहीं आ सकेगा क्योंकि सर्वोदय की पूरी धारणा ही मनुष्य को आदिम व्यवस्था की तरफ लौटाने की है। सर्वोदय की धारणा ही पूंजीवाद की विरोधी है। लेकिन पूंजीवाद से आग ेले जाने के लिए नहीं समाजवाद से पीछे ले जाने के लिए है। पूंजीवाद से दो तरह से छुटकारा हो सकता है। या तो पूंजीवाद स ेआगे जाएं या पूंजीवाद से पीछे लौट जाएं। लौटना कुछ लोगों को सदा सरल मालूम होता है और आकर्षक भी। लेकिन पीछे लौटना न तो संभव है न ही उचित। जाना सदा आगे ही पड़ता है.चाहे मजबूरी में या स्वेच्छा से। जो मजबूरी में जात ेहैं वे घिसटत ेहुए पशुओं की तरह जात ेहैं। जो स्वेच्छा से जाता है उसकी चाल में एक गति, एक आनंद और भविष्य को पाने की स्फूर्ति, खुशी, आशा और सपना होता है।

हमार ेदेश में पीछे की तरफ जाने की बात इस कदर घर कर गई है कि जब भी मुसीबत हो हम पीछे की तरफ हटना चाहते हैं। उसके कारण मनोवैज्ञानिक हैं। उन्हें थोड़ा समझना चाहिए। पहली बात यह है प्रत्येक मनुष्य केमन में यह विचार है कि पहले सब अच्छा था, गांव अच्छे थे, शहर बुरा है। क्योंकि शहर नया है गांव पुराना। लेकिन ये बाते वही लोग कहते हैं जो शहरों में रहतेहैं, गांव वाले नहीं। गांव की जिंदगी एक दिन घूमकर देख आना और बात है और गांव में जीना बिल्कुल अलग बात है। साथ ही मजेदार बात यह ह ैकि सर्वोदय पर व गांव पर और प्राचीन ग्रामीण व्यवस्था पर, पंचायत व्यवस्था पर जिन लोगों का बहुत जोर ह ैवे सब गांव में नहीं रहत ेहैं। सब शहरों में रहतेहैं।

शहरों में वे किताबें लिखते हैं गांवों की सुंदर, प्राकृतिक जिंदगी के संबंध में। यह भ्रम जो हम पालते हैं, मनमोहक होत ेहैं लेकिन खतरनाक हैं। गांव का कोई भविष्य नहीं है। भविष्य ह ैशहर का। आनेवाली दुनियां में गांव नहीं होंगे। बस शहर होंगे, और बड़े शहर, जिनके लिए हम कल्पना भी नहीं कर सकते। गांव जो है वह वैसा ही ह ैजैसे झोपड़ा है। आनेवाली दुनिया में झोपड़ा नहीं होगा, गांव भी नहीं होगा। असल में आनेवाली दुनिया ग्रामीणों की नहीं नागरिकों की दुनिया होने वाली है। सच तो यह है कि जैसै-जैसे हम आगे बढ़ेगे वैसे-वैसे आदमी जमीन से मुक्त होगा और जब तक आदमी जमीन से पूरी तरह मुक्त नहीं होता तब तक वह पूरी तरह सुसंस्कृत नहीं हो पाएगा।



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