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पढिय़े पारसमणि पत्थर के बारे में, जिसे छूते ही लोहा भी सोना हो जाता है

Posted on : Dec 20 2016


पढिय़े पारसमणि पत्थर के बारे में, जिसे छूते ही लोहा भी सोना हो जाता है

तारा पाटकर, इंडिया इमोशंस न्यूज  महोबा। महोबा के ऐतिहासिक तालाब कीरत सागर के गर्भ में समाया हुआ है पारसमणि का रहस्य। कीरत सागर को यहां पारसमणि वाला तालाब भी कहते हैं। पारसमणि यानी एक ऐसा पत्थर जिसे छूते ही लोहा सोना बन जाता है। कहते हैं वीर भूमि महोबा के पश्चिमी छोर पर सन 1060 में निर्मित इस सबसे गहरे तालाब में चंदेल राजा परमार्दिदेव ने पारसमणि को फेंकवा दिया था। पर उन्होंने इस पारसमणि को क्यों फिकवाया, पारसमणि कहां गई और उसको आज तक क्यों नहीं खोजा जा सका, ऐसे तमाम सवाल अब तक रहस्य बने हुए हैं और उनके जवाब आज भी यहां के इतिहासवेत्ता ढूंढ रहे हैं।

सन 1182 में दो किलोमीटर में फैले कीरत सागर के तट पर ही चंदेल राजा परमार्दिदेव व दिल्ली के सम्राट पृथ्वी राज चौहान के बीच भीषण युद्ध हुआ था जिसमें दोनों राजाओं को भारी क्षति हुई थी। ऊदल समेत हजारों योद्धा मारे गये। जिसका लाभ मुहम्मद गोरी व कुतुबउद्दीन ऐबक ने उठाया और राजपूतों को परास्त कर सत्ता हथिया ली। महाकवि जगनिक ने आल्हा खंड व परमाल रासो और चंदवरदाई ने पृथ्वीराज रासो में इन ऐतिहासिक घटनाओं का रोचक वर्णन किया है। जहां तक पारसमणि और कीरत सागर की बात है तो पारसमणि यहां कपोल कल्पना की चीज बन चुकी है। और हजार साल पुराना रहस्यमयी कीरत सागर लोगों के शौच जाने का एक अड्डा। बची-खुची कसर पूरी कर दी अतिक्रमण ने। आधे तालाब पर तो भूमाफियाओं ने कब्जा कर लिया है और मकान बनवा लिए हैं।

प्रशासन भी वोट बैंक की राजनीति की वजह से इन मकानों को हटाने में लाचार हो गया है। तालाब के घाट बरबाद हो गये हैं और सारी सीढियां टूट चुकी हैं। जलकुंभी पटी पडी है। बस सावन में जरूर कीरत सागर के इस तट पर कजली का मेला लगता है जो हजार साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है। दूर-दूर से लोग उसमें शामिल होने के लिए आते हैं। प्रशासन ने इस मेले को अब आल्हा महोत्सव का नाम दे दिया है जो रक्षा बंधन के वक्त एक सप्ताह तक चलता है। महोबा की एक पूर्व जिलाधिकारी डॉ. काजल ने जरूर आल्हा महोत्सव को राष्ट्रीय स्तर की मान्यता दिलाने के लिए लिखा.पढी की थी लेकिन अब तक हो कुछ नहीं पाया है। कीरत सागर अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। अब बात करते हैं पारसमणि की जिसके बारे में आल्हा खंड में लिखा है- ..पारस पथरी है महुबे मां, लोहौ छुवत सोन हुय जाय



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