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पढिय़े कोरोना लॉकडाऊन काल की कविता- सच पूछो जी लेते थे, ऐ जिंदगी हर दिन हम तुझे चूम लेते थे

Apr 17 2020

पढिय़े कोरोना लॉकडाऊन काल की कविता- सच पूछो जी लेते थे, ऐ जिंदगी हर दिन हम तुझे चूम लेते थे

सच पूछो जी लेते थे, ऐ जिंदगी हर दिन हम तुझे चूम लेते थे...
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कभी पान खाकर- चबाकर थूक देेते थे, शक हुआ तो सूंघ भी लेते थे
खांस लेते थे... छींक लेते थे, पूरी बत्तीसी बाहर निकाल कर हंस लेते थे,
सच पूछो जी लेते थे, ऐ जिंदगी हर दिन हम तुझे चूम लेते थे
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सूरत खोलकर रहते थे, यूं तो कातिल सा बोध होता है चेहरा ढके हुए,
नकाब उतार कर जो देखता हूं आईना, कहता है लगते हो थके हुए,
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याद आते हैं वो समोसे, वो गोलगप्पे, कहां गईं वो जलेबियां, वो खस्ते,
वो दोस्तों की महफिलें बिखर गईं, कई रातेे गुजर गई उनसे मिले हुए
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वो गिलासें टकरा कर चीयर्स बोलना, वो बोतल का ढक्कन टप से खोलना
दो-चार कश लेकर थम देते थ्रे, पत्तों की बाजी भी जमकर खेलते थे
सच पूछो जी लेते थे, ऐ जिंदगी हर दिन हम तुझे चूम लेते थे
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अब तो...
सांस ही ले रहे हंै तेरा एहसास करने के लिए, तरस जो गये हैं तुझसे मिलने के लिए
कहीं तुझे हम जीना भूल न जाएं, लौट आओ ऐ जिंदगी हमारे साथ रहने के लिए.
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एक अच्छी सी जिंदगानी पाने की होड़ में, परेशां रहते थे हम हर मोड़ पे
हमें अब दिल-ए-एहसास है, तू जैसी भी है, जितनी भी है हमारे लिए सबसे खास है...
हमारे लिए सबसे खास है

लेखक: अजय दयाल इलाहाबादी